Ye Ishq Nahin Aasan -- Pustak Samiksha : Atulya Khare


        .  Pustak Samiksha : Atulya Khare

  • समीक्षित पुस्तक : ये इश्क नहीं आसां

  • विधा : “कथेतर”

  • सम्पादन : राजेन्द्र राजन

  • समृद्द पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित

  • प्रथम संस्करण : 2025

  • मूल्य : 399.00

  • समीक्षा क्रमांक : 244

                                                                    

Ye Ishq Nahin Aasan front Main Cover

                                                 
“ये इश्क नहीं आसां” राजेन्द्र राजन जी द्वारा संकलित एवं संपादित तथा समृद्द पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित एक संग्रहणीय “कथेतर” संग्रह है।

पुस्तक हाथ में लेने के भी पूर्व जो प्रश्न सहज ही उपस्थित हो जाता है वह है पुस्तक की विधा से संबंधित, कि ““कथेतर”” आखिर क्या है, सो सर्व प्रथम शुरुआत यहीं से करते हैं एवं “कथेतर” क्या है आसान शब्दों में समझने का प्रयास करते हैं।

ऐसा लेख जहां कल्पना कम हो बस, जो देखा, जो महसूस किया या फिर जो सुना वही लिखते हैं।
वहीं कहानी से इतर इसमें लेखक की उपस्थिति प्रत्यक्ष है न की कहानी के समान परोक्ष। “कथेतर” यथार्थ दर्शाता है कहानी हमें कल्पना लोक में भ्रमण कराती है, कहानी लेखक की कल्पना शक्ति की उड़ान है वह दूसरी दुनिया में ले जाती है किन्तु “कथेतर” हमें अपनी दुनिया में ही रखता है। इतिहास, समाज, व्यक्ति, सबका यथार्थ यानि सच्चा कच्चा चिट्ठा तो “कथेतर” ही देता है।

इस परिभाषा रूपि स्पष्टीकरण के पश्चात सहज ही जो अगला प्रश्न मन मस्तिष्क में कौंधता है वह है कि यदि इस परिभाषा को ही स्वीकार कर लें तो फिर “कथेतर” के अंतर्गत क्या आएगा, तो उपरोक्त विवरण के आधार पर कह सकते हैं कि निबंध, संस्मरण, रेखाचित्र, आत्मकथा, यात्रा-वृत्तांत, सूचना, विचार प्रदान करना, अनुभव बाँटना, किसी व्यक्ति अथवा घटना का सच्चा चित्र प्रस्तुत कर देना एवं रिपोर्ताज अर्थात घटना की आँखों-देखी रिपोर्ट, डायरी, पत्र, साक्षात्कार ये भी “कथेतर” में ही वर्गीकृत किये जाते हैं।

वैसे कुछ ज्यादा ही आसान शब्दों में कहना चाहें तो वह गद्य जो कहानी कहने के लिए नहीं, सच कहने के लिए लिखा जाए वो “कथेतर” है। रेखाचित्र भी इसी बड़े परिवार का सदस्य है। सामान्य तौर पर हिंदी गद्य का एक बड़ा हिस्सा “कथेतर” का ही है अब यह बात जुदा है की उसमें सभी को उनके उपनाम यथा निबंध, संस्मरण इत्यादि से अधिक पहचान जाता है।

प्रस्तुत पुस्तक “ये इश्क नहीं आसां” साझा संकलन है संस्मरणों का, पुस्तक का प्रारंभ, “कथेतर” पर एक शोध परक लेख से हुआ है, जिसे वरिष्ठ साहित्यकार, एवं इस पुस्तक के संकलनकर्ता, संपादक राजेन्द्र राजन जी ने स्वयं लिखा है, यहाँ विशेष उल्लेख के साथ कहना चाहूँगा कि “कथेतर” की इस से आसान, सुंदर एवं सरल व्याख्या नहीं हो सकती। उन्होंने बहुत तफ़सील से “कथेतर” के विषय में बात रखी है।

उनके इस लेख में से संबंधित अंश को पाठकों के लाभार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ ताकि “कथेतर” पूर्ण रूप से स्पष्ट हो सके। यहाँ वे कहते हैं कि यदि “कथेतर शब्द की शाब्दिक व्यंजना की जाए तो इसका संधि विच्छेद होगा कथा से इतर। अर्थात जो कथा नहीं है वह “कथेतर” है। लेखक अपने मन की बात बेबाकी से कहते है वह जीवन में घटी छोटी बड़ी मार्मिक अविस्मरणीय घटना हो अथवा प्रसंग। “कथेतर साहित्य की एक मांग अथवा विशेषता कही जा सकती है कि लेखक जिस किसी घटना, स्मृति अथवा प्रसंग को लिपिबद्द करता है उसे उसमें पूरी ईमानदारी बरतना सबसे अहम शर्त है। किसी भी प्रकार से कल्पित, अथवा अन्यथा सृजित कथानक प्रस्तुतीकरण कथेतर नहीं बन सकता

Ye Ishq Nahin Aasan Back Cover
राजन जी के मुताबिक “कथेतर” साहित्य संभवतः साहित्य की कहानी उपन्यास कविताओं जैसी विधाओं से, पाठक की विमुखता के फलस्वरूप लोकप्रियता हासिल कर रहा है। सफलता के चरम पर शीघ्र पहुचने के प्रयास में आत्ममुग्ध लेखक अपने पाठक से दूर हो रहे हैं।

“कथेतर” रचनाओं को वांक्षित सफलता एवं प्रसिद्दी न मिलने हेतु ज्ञात अज्ञात कारणों का विश्लेषण करना विषयांतर होगा अतः बात करें “मैंने मांडू नहीं देखा” की जिसे लेखक ने सर्वश्रेष्ट “कथेतर” माना है एवं इस पुस्तक में शामिल भी किया है। स्वदेश दीपक रचित इस पुस्तक में “मैं की भूमिका काफी है जहां दीपक जी ने दर्शाया है कि “मैंने मांडू नहीं देखा” बाहरी समय का इतिहास नहीं है यह खंडित आत्म संस्करण है। इसी प्रकार काशीनाथ सिंह का 2006 में पा उपन्यास 'कासी का अस्सी" बनारस के अस्सी घाट के इर्द गिर्द वास्तविक पात्र, परिवेश, तथा परिस्थिति पर आधारित है। काशीनाथ जी का यह उपन्यास “कथेतर” का जीवंत उदाहरण है जिसमें कल्पनाशीलता का सहारा कम से कम लिया गया है

“कथेतर” में वह ताकत है कि वह मजबूती के साथ इतिहास के साथ खड़ा हो सके“कथेतर” को स्वयं को प्रमाणित करने के लिए विधा की किसी परंपरा में अपने को रखना आवश्यक नहीं हैएक कहानी, उपन्यास का मूल्यांकन परंपरा में रखकर होता है परंतु “कथेतर” स्वयं में संपूर्ण और स्वतंत्र है।

“कथेतर” का भविष्य इसकी स्वतंत्र पहचान में है पाठक से वह आत्मीयता से ही जुड़ता है और यह विद्या लेखक और पाठक को भावनात्मक स्तर पर जोड़ती है

पुस्तक में खुशवंत सिंह, मिंटो, इस्मत चुगताई, साहिर लुधियानवी, अमृता प्रीतम, चार्ली चैपलिन, निर्मल वर्मा, भीष्म साहनी, दुष्यंत, धर्मवीर भारती, अल्पना मिश्रा, स्वदेश दीपक, सुषमा मुनीन्द्र, संतोष श्रीवास्तव, विभा रानी, हेतु भारद्वाज एवं राजेन्द्र राजन जैसे स्वनामधन्य, मूर्धन्य 15 महान शख्सियतों  के संस्मरण हमें पढ़ने मिलते हैं   हैं । इन तमाम, विशिष्ट साहित्यिक विभूतियों के अनसुने, अनकहे, रोचक, संस्मरण राजन जी ने विभिन्न पुस्तकों, लायब्रेरियों इत्यादि से खोज कर पुस्तक रूप में सँजोये हैं एवं इस सराहनीय दुर्लभ प्रयास हेतु उन्हें कोटिश: साधुवाद।

            

पुस्तक का त्रुटिहीन प्रकाशन, आकर्षक कलेवर में, समृद्द पब्लिकेशन द्वारा किया गया है, विशेषतः पुस्तक का आवरण पृष्ट आकर्षित करता है, आवरण चित्र में एक पात्र में पनपते हुए पौधे को दर्शा कर “कथेतर” विधा के उन्नयन एवं विकास के विषय में संकेत किया गया है।

संस्मरण के इस संग्रह की शुरुआत होती है खुशवंत सिंह जी के संस्मरण से जिसमें उन्होंने मशहूर कलाकार लेखिका अमृता शेरगिल के विषय में बहुत सी जानी अंजानी साफ सुथरी तो कुछ विवादित बाते रखीं हैं उनके निम्फोमेनिक होने लेस्बियन होने या फिर उनके बद्दिमाग होने के कई किस्से और फिर अंत में उनकी दुनिया से रुखसत होने की बात। स्वाभाविक घटनाक्रम जिसे खुशवंत जी बयान करते हुए संपूर्ण चित्र सामने ले आते हैं ।

दूसरा संस्मरण इस्मत चुगताई के विषय में है सआदत हसन मंटो का "क्या मंटो कुंवारा है" शीर्षक से। इस्मत और मंटो की शादी को लेकर काफी बाते हुईं हैं उसी विषय में मंटों कहते हैं की हकीकत कुछ भी हो लेकिन सच है कि सारे हिंदुस्तान में सिर्फ हैदराबादी ही मेरी और इस्मत की शादी को लेकर चिंतित रहे उस वक्त तो मैंने गौर नहीं किया था लेकिन अब सोचता हूं कि मैं और इस्मत वाकई मियां बीवी बन जाते तो क्या होता। वहीं वे इस्मत के अपने भाई के प्रति प्रेम और आदर की भावनाओं की बात भी रखते है, और एक जगह और भी लिखते हैं इस्मत परले दर्जे की जिद्दी है, तबीयत में बिल्कुल बच्चों के जैसी, वे लिखते हैं की इस्मत की औरत होने का असर उसके अदब के हर नुक्ते में मौजूद है जो उसे समझने में हर कदम पर हमारा पथप्रदर्शन करता है, इस्मत पर बहुत कुछ कहा गया और कहा जाता रहेगा कोई उसे पसंद करेगा और कोई ना पसंद, लेकिन लोगों की पसंद और ना पसंद से ज्यादा अहम इस्मत की रचनात्मक शक्ति है

“ये इश्क नहीं आसां” संस्मरण अमृता प्रीतम का है जहां वे अपने साहिर (साहिर लुधियानवी) के प्रति उस प्रेम को याद करती हैं जो कभी मुकम्मल न हुआबाद में भी इमरोज़ से उनके रिश्ते में होने पर साहिर टूटे भी, इस सब में से कुछ कुछ जिक्र उनके उपन्यास एक थी अनीता में भी आ गए हैं, पाठकों को याद ही होगा कुछ दिन पहले ही एक थी अनीता की समीक्षा लिखी थी तब बात करी थी मैंने उस बारे में। साहिर से अपनी मुहब्बत के विषय में वे कहती हैं की जब उनका बेटा होने को था, वह सदा यही सोचती रही की बेटा साहिर जैसा हो और हुआ भी यहीयहां तक कि बाद में उनसे यह सवाल उनके उसी बेटे सहित और भी कई ने पूछ लिया। साफगोई और सच्चाई उनके लेखन में बहुत स्पष्ट हैं।लेकिन इस कदर एक दूसरे से मोहब्बत के बावजूद न कभी साहिर ने न ही अमृता ने अपनी मोहब्बत की दुहाई दीं।

चार्ली चैपलिन का संस्मरण चर्चिल और गांधी से भेंट” यूं तो सामान्य मुलाकातों की ही जानकारी रही जहॉ तमाम बड़ी हस्तियों से मुलाकात और उनके बीच उनका स्वयं के सीमित ज्ञान के चलते हास्यास्पद स्थितियों का बना शामिल था, जिन के विषय में उन्होनें बेझिझक बताया वहीं गांधी जी की मुलाकात का बहुत सीमित सा ही विवरण दिया है किन्तु इतने कम समय में चार्ली उनसे कितने प्रभावित हुए यह बखूबी दर्शाया है।

                        

निर्मल वर्मा की चीढ़ों पर चांदनी कोई अलग से लिखे गए संस्मरण का खंड या हिस्सा नहीं है अपितु यह इसी नाम से लिखित उनकी एक कहानी का ही अंश है जो शिमला, सोलन में उनके बचपन के दिनों के कुछ दृश्य प्रस्तुत करती है। उनकी शैली मानो किसी कविता सी लगती है या फिर कभी किसी पहाड़ी नदी सी, जो बलखाती हुई बस चली जा रही हो ।

भीष्म साहनी का संस्मरण मेरी पहली प्रेम कहानी अत्यंत रोचक तरीके से लिखा गया संस्मरण है जहां उन्होंने अपने कॉलेज के ज़माने की बाते बेहद ईमानदारी से अपनी सुंदर भाषा और लचकदार शैली में रखी की कैसे स्कूल कॉलेज की सख्ती उस जमाने के लड़कों के प्रेम की आग पर पानी फेरती थी, और खुदा न खस्ता अगर कोई प्रेम जैसा गंभीर गुनाह कर ही बैठे तो फिर तो सारा समाज, शहर, मोहल्ला खड़ा है उन्हें सख्ती से नैतिकता का पाठ पढ़ाने को। खैर अंततः उन्हें अपनी पहली प्रेम कहानी लिखने का प्लॉट मिल ही गया, कैसे, उसका भी रोचक किस्सा बयां किया है।

संस्मरण इलाहाबाद मर गया है धर्मवीर भारतीं जी का अत्यंभावुक पत्र है सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी के नाम। और फिर उसका उत्तर भी जो सर्वेश्वर जी द्वारा दिया गया। पत्र अत्यंत व्यथित हृदय से वसंत ऋतु में लिखा गया जब नीम के पेड़ों की पत्तियां झड़ रही है, उस बीच वे दो इलाहाबादों की बात करते हैं कि इस मेरे वाले इलाहाबाद में यह सब है और वे अपने, साहित्यिक मित्रों की, संगोष्ठियों की याद करते है वहीं वे दूसरे इलाहाबाद की बात करते हैं कि वह मेरा नहीं है। दरअसल वे सिर्फ समय के साथ बदल गए उन सब निशानों कों ढूंढते प्रतीत होते हैं, जो तत्कालीन इलाहाबाद में थे या शायद उन यादों को फिर से जी लेने की कोई ख्वाहिश ज़ाहिर करते हैं। वहीं सर्वेश जी का पत्र तो और भी मार्मिक है। सिर्फ एक पत्र उन महान साहित्यकारों की शैली, सोच एवं संस्कारों का परिचय दे जाता है जिसकी वर्तमान में निश्चय ही बहुत बहुत आवश्यकता हैं।

“मैं और मेरी गजलें” संस्मरण है दुष्यंत जी का, जिसमें वे सबसे पहले यही मुद्दा उठाते है कि मैं ग़ज़ल क्यों लिखने लगा यह प्रश्न क्यू पूछा जाता है, और प्रत्युत्तर में बहुत बेबाकी से वे कहते हैं कि कवि यदि शैली में परिवर्तन करे तो चकित नहीं होना चाहिए। वहीं वे यह भी कुबूल करते हैं की गालिब का शतांश भी उनमें नहीं है गजल लिखने के विषय में ही वे कविता की वर्तमान स्थिति पर विशेष रूप से कमेंट करते हुए लिखते हैं कविता में आधुनिकता के छद्म ने कविता को पाठकों से दूर कर दिया है।

वर्तमान में कविता के बारे में कहा जाता है कि यह सामाजिक और राजनीतिक क्रांति की भूमिका तैयार कर रही है वे सवाल उठाते हैं की मेरी समझ में यह वक्तव्य भ्रामक है, जो कविता लोगों तक पहुंचती ही नहीं वह किसी भी क्रांति की संवाहिका कैसे हो सकती है। हाल की कविताओं में यह कह पाना भी मुश्किल है कि यह किसकी कविता है और कविता है भी या नहीं इसलिए मैंने उर्दू के इस पुराने और जाँचे परखे माध्यम की शरण ली हैअपनी भाषायी कमजोरी और फिर हिंदी उर्दू को मिलाकर लिखी गई उनकी गजल पर बेबाकी से उन्होंने अपनी कमजोरी स्वीकार की है, उनकी स्पष्टवादिता के साथ ही हिंदी कविता के गिरते स्तर पर चिंता इस संस्मरण में प्रत्यक्ष लक्षित है।

अल्पना मिश्र की "मेरी जापान यात्रा' एक रोचक यात्रा भ्रमण संस्मरण है जो है अत्यधिक मनोरंजक और रोचक। बहुत तफसील से जापानी सभ्यता, पुरातन संस्कृति, व्यवहार, साफ स्वच्छ परिवेश तथा प्रेम एवं सम्मान से आह्लादित कर देने वाले लोगों के विषय में बेहद सरलता से लिखा गया है।

Ye Ishq Nahin Aasan : rajendra Rajan
सुषमा मुनींद्र का “गौरैया से इश्क़” यूं तो उनके संस्मरण ही हैं किन्तु गौरैया के विषय में बताते हुए वे इतनी ज्यादा भावुक और करीबी हो उठती हैं की उस से एक बेहद आत्मीय सा जुड़ाव हो जाता है। संपूर्ण लेखन में वे अत्यंत सहज रहते हुए गौरैया के विषय में कुछ ऐसे बयां करती हैं कि वह सहज वार्तालाप ही प्रतीत होता है। सहज एवं सुंदर शांत लेखन, बस ऐसा कि पाठक को सहज ही अपनापन लगने लगे ।

संतोष श्रीवास्तव का संस्मरण लेख बीथोवन के देश में एक यात्रा वृतांत संस्मरण है जिसमें लेखिका ने अपनी आस्ट्रिया की यात्रा का मनोरंजक एवं जानकारी से लबरेज विवरण प्रस्तुत किया है। संस्मरण बीच में थोड़ी देर के लिए भावुकता में भीग जाता है जहां लेखिका अपने पुत्र की याद में डूब जाती है।

औरते बस औरते है मशहूर नाट्यकर्मी, बहुमुखी प्रतिभा की धनी, लेखिका कलाकार विभा रानी के संस्मरण हैं हालांकि इसे उन्होंने कहीं नाटकों में भी इस्तेमाल किया है नाटक "विम्ब प्रतिविम्ब" में, जहां उन्होंने जेल में किसी प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान महिला कैदियों से मुलाकात के अपने तजुर्बे साझा किये, विशेष तौर पर एक ऐसी महिला की संपूर्ण जीवन गाथा ही है प्रस्तुत संस्मरण जो अपने पति की हत्या के जुर्म में आजीवन कैद की सजा काट रही थी। अंत में उन्होंने बहुत सटीक बात लिखी है कि अपराधी का सिर्फ़ अपराध न देख कर उसके पीछे छिपे कारण अवश्य देखने समझने चाहिए, विशेष तौर पर यदि अपराधी कोई महिला है तब।



उत्तर प्रदेश और हरियाणा के कुछ क्षेत्र विशेष के अधिकांश कृषक जिस तरह से अपनी पीढ़ियों की पूंजी जमीन, और अपना पुश्तैनी कृषि कार्य छोड़ कर जमीन किसी भी तरह सरकार को देकर मुआवजा प्राप्त कर तथा आम तौर पर कुछ न करने की प्रवृति में अपना सर्वनाश कर रहे हैं उसी हालत को बहुत विस्तार से एवं सूक्ष्मता से हर मुद्दे पर गौर करते हुए यह संस्मरण "कृषि संस्कृति का लोप' जिसे लिखा है हेतु भारद्वाज ने । इसमें जहां वे ज़मीने बिक जाने से होने वाले व्यक्तिगत नुकसान के प्रति चिंता जाहिर करते हैं वहीं उनकी गंभीर प्रतिक्रिया एवं चिंता पर्यावरण तथा प्रकृति के प्रति भी है। साथ ही यूपी के ग्रामीण इलाकों में तेजी से बदले सामाजिक-आर्थिक हालात की झलक है। 

गुलेरी का गुलेर राजन जी का ही संस्मरण है। क्या नाम से कुछ अंदाज लगा पा रहे हैं है यह किस विषय में हैं, नहीं तो चलिए आपको बता दें , यह संस्मरण है उनकी उस यात्रा का जो उन्होंने "उसने कहा था" के अविस्मरणीय लेखक चंद्र धर शर्मा "गुलेरी" के गांव गुलेर के पश्चात लिखे। आज तकरीबन डेढ़ शती बाद भी कालजयी कहानी "उसने कहा था" लोगों के ज़ेहन में वैसी ही ताजा है और वैसे ही गुलेरी भी, किन्तु उनके आवास की जर्जर अवस्था अवश्य ही उनके प्रशंसकों के लिए एक टीस पैदा करने वाला विषय है। गूलर के संस्मरण लिखते हुए राजन जी जहां एक ओर शर्मा जी की साहित्यिक यात्रा एवं राजपुरोहिति के किस्से साझा करते रहे वहीं उनके सहज किन्तु रोचक शब्दों से गांव का वर्णन सजीव हो उठा।

         अतुल्य खरे

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